
सिवनी की शिक्षिका के नवाचारों की गूंज जिले तक पहुंची, गणित और भाषा को खेल-खेल में सिखाने की अनूठी पहल ने दिलाई पहचान
Kpn24.com जांजगीर-चांपा 08 सितंबर 2026
कबाड़ को उपयोगी शिक्षण सामग्री में बदलकर बच्चों की पढ़ाई को आसान और रोचक बनाने वाली चांपा से लगे ग्राम सिवनी की शिक्षिका श्रीमती संध्या देवांगन ने जिले का गौरव बढ़ाया है। शासकीय कन्या प्राथमिक शाला सिवनी में पदस्थ संध्या देवांगन को शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य और अभिनव प्रयोगों के लिए मुख्यमंत्री गौरव अलंकरण ‘शिक्षा दूत सम्मान-2026’ से सम्मानित किया गया।
कलेक्ट्रेट सभागृह में आयोजित शिक्षा पर संवाद, कार्यशाला एवं कार्ययोजना समारोह में कलेक्टर जन्मेजय महोबे और जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा ने उन्हें प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न, श्रीफल, शाल और 5 हजार रुपये की नगद राशि प्रदान कर सम्मानित किया।
कबाड़ बना बच्चों की पढ़ाई का हथियार
श्रीमती देवांगन ने ‘कबाड़ से जुगाड़’ तकनीक को अपनी शिक्षण पद्धति का हिस्सा बनाकर अनुपयोगी वस्तुओं से आकर्षक शिक्षण सहायक सामग्री तैयार की। इन सामग्रियों के माध्यम से बच्चों को गणित और भाषा जैसे विषयों को खेल-खेल में समझने और सीखने का अवसर मिला। उनके नवाचारों से विद्यार्थियों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ी और कठिन विषय भी उनके लिए आसान हुए।
विकासखंड से जिला स्तर तक दिखाया हुनर
श्रीमती देवांगन ने कबाड़ से जुगाड़ और बुनियादी साक्षरता एवं संख्याज्ञान (एफएलएन) प्रतियोगिताओं में विकासखंड से लेकर जिला स्तर तक उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उनके नवाचारों की प्रस्तुति तत्कालीन कलेक्टर आकाश छिकारा के समक्ष भी हुई थी, जिसे सराहना मिली।
इसी उत्कृष्ट कार्य, नवाचार और विभागीय मूल्यांकन के आधार पर उनका चयन शिक्षा दूत सम्मान-2026 के लिए किया गया।
गांव में खुशी, सोशल मीडिया पर बधाइयों की बौछार
सम्मान मिलने की खबर सामने आते ही सिवनी गांव में खुशी का माहौल बन गया। गांववासियों, विद्यालय परिवार और शुभचिंतकों ने फोन तथा सोशल मीडिया के माध्यम से शिक्षिका संध्या देवांगन को बधाई और शुभकामनाएं दीं।
ग्रामीणों ने कहा कि यह सम्मान केवल एक शिक्षिका की उपलब्धि नहीं, बल्कि सिवनी गांव और पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का क्षण है। शिक्षा विभाग, संकुल समन्वयक और क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने भी उनकी उपलब्धि पर हर्ष जताते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
संध्या देवांगन की यह उपलब्धि इस बात की मिसाल है कि संसाधनों की कमी कभी सीखने-सिखाने की राह में बाधा नहीं बनती—जरूरत होती है तो सिर्फ नए सोच और कुछ कर गुजरने के जज्बे की।










