
मनीष विद्यार्थी | खरगोन |
KPN24:-सरकार ने गरीब और जरूरतमंदों को आपात स्थिति में तत्काल इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च कर 108 एम्बुलेंस सेवा शुरू की, लेकिन जिले में यही जीवन रक्षक सेवा आज खुद बदहाली की शिकार नजर आ रही है। टेंडर प्रक्रिया के चलते जिला चिकित्सा विभाग का इस सेवा पर सीधा नियंत्रण नहीं रह गया है, जिसका सीधा फायदा ठेकेदार और उसके कर्मचारी उठा रहे हैं।
नतीजा—मनमानी, अव्यवस्था और गरीब ग्रामीणों की खुलेआम फ़जीहत।
जानकारी के अनुसार खरगोन जिले में जननी एक्सप्रेस और 108 एम्बुलेंस मिलाकर चार दर्जन से अधिक वाहन मौजूद हैं, लेकिन ठेकेदार की लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये के चलते इनका नियमित और प्रभावी संचालन नहीं हो पा रहा। दूरदराज़ ग्रामीण इलाकों में मरीजों को एम्बुलेंस नहीं मिलती, मजबूरी में परिजनों को निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे न सिर्फ समय बर्बाद होता है बल्कि कई बार मरीज की जान पर भी बन आती है।
लोकेशन से नदारद, अस्पताल में खड़ी रहती हैं एम्बुलेंस
नियमानुसार 108 एम्बुलेंस को तय लोकेशन पर हर समय तैनात रहना चाहिए, लेकिन हकीकत इससे उलट है। आमतौर पर आधा दर्जन एम्बुलेंस जिला अस्पताल स्थित ठेका कंपनी के ऑफिस में खड़ी मिल जाती हैं, वहीं करीब इतनी ही गाड़ियां मंडलेश्वर में एक मैकेनिक के पास “मेंटेनेंस” के नाम पर कबाड़ बन रही हैं।
इस लापरवाही का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। जरूरत के वक्त लोग घंटों इंतजार करते रहते हैं और आखिरकार किराए का वाहन खोजने को मजबूर हो जाते हैं।
विवादों से रहा है 108 सेवा का पुराना नाता
जिले में 108 एम्बुलेंस सेवा का नाम लंबे समय से विवादों से जुड़ा रहा है। कभी इसके पायलट सरकारी वाहन को शराब दुकान के सामने खड़ा कर शराब खरीदते नजर आए, तो कभी आधी रात को मरीज की जगह शराब की पेटियां ढोते हुए पकड़े गए। हैरानी की बात यह है कि इन घटनाओं के बाद भी न तो ठेकेदार पर कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही व्यवस्था में कोई सुधार दिखाई दिया।
सवालों के घेरे में ठेकेदार और प्रशासन
जीवन रक्षक सेवा के इस हाल ने ठेकेदार की कार्यप्रणाली के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब करोड़ों की योजना जमीन पर दम तोड़ती नजर आए, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है।










