
सब्जी बाड़ी, पोषण वाटिका, मुर्गी-मछली पालन और वनोपज से ग्रामीण महिलाओं की आय में बढ़ोतरी
KPN24.com रायपुर 12 अप्रैल 2026
छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर क्षेत्र में महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक नई क्रांति देखने को मिल रही है। “दीदी के बखरी” पहल के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं एकीकृत कृषि मॉडल अपनाकर आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। सब्जी बाड़ी, पोषण वाटिका, मुर्गी पालन, वनोपज संग्रहण और मछली पालन जैसी गतिविधियों से न केवल परिवार को पौष्टिक आहार मिल रहा है, बल्कि अतिरिक्त आय के नए स्रोत भी विकसित हो रहे हैं।
बिहान योजना के अंतर्गत उत्तर बस्तर के कांकेर जिले में महिला स्व-सहायता समूहों को आजीविका से जोड़ने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। महिलाएं अपने घर की बाड़ी (बखरी) में व्यावसायिक रूप से सब्जियां उगाकर बाजार में बेच रही हैं। इसके साथ ही मुर्गी पालन, बकरी पालन, मछली पालन तथा वनोपज संग्रहण के माध्यम से अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर रही हैं।
जिले के चार विकासखंड — नरहरपुर, कांकेर, चारामा और भानुप्रतापपुर — में यह योजना संचालित की जा रही है। प्रत्येक संकुल में चार-चार गांवों को शामिल कर महिलाओं को एकीकृत कृषि गतिविधियों से जोड़ा गया है। योजना का मुख्य उद्देश्य महिला किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है, जिससे उनकी औसत मासिक आय 20 से 25 हजार रुपये तक पहुंच सके।
जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के मार्गदर्शन में यह योजना जिले में प्रभावी ढंग से संचालित हो रही है। वर्तमान में नरहरपुर में 1200, कांकेर में 790, चारामा में 734 तथा भानुप्रतापपुर में 640 महिलाएं इस पहल से जुड़ी हुई हैं। इस प्रकार कुल 3364 महिला किसान विभिन्न आजीविका गतिविधियों के माध्यम से अपनी आय बढ़ा रही हैं।
वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस पहल का विस्तार करते हुए 10,780 महिलाओं को इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए प्रत्येक क्लस्टर स्तर पर आजीविका सेवा केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं, जिन्हें स्वयं महिलाएं संचालित करेंगी। इन केंद्रों के माध्यम से महिलाओं को बीज, कृषि उपकरण और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी।
हाल ही में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने नरहरपुर, चारामा, भानुप्रतापपुर और कांकेर के विभिन्न गांवों का दौरा कर महिला किसानों के कार्यों का निरीक्षण किया। नरहरपुर विकासखंड के ग्राम रावस और बांसपत्तर में महिला किसान सुरेखा नेताम द्वारा तैयार की गई बखरी में ग्राफ्टेड सब्जियों की खेती और मुर्गी पालन को देखकर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की। सुरेखा ने बताया कि हरी पत्तेदार सब्जियां, कंद-मूल और फल न केवल पोषण देते हैं बल्कि एनीमिया जैसी समस्याओं से भी बचाव में सहायक हैं।
इसी तरह ग्राम ठेमा की महिला किसान नामिका यादव द्वारा वनोपज संग्रहण, मुर्गी पालन और मछली पालन के कार्यों को भी सराहा गया। ग्रामीण और जनजातीय समुदाय महुआ, इमली, शहद, लाख और औषधीय जड़ी-बूटियों का संग्रहण कर उन्हें बाजार में बेचकर अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं।
भानुप्रतापपुर विकासखंड के ग्राम हाटकर्रा की महिला मोतिन दर्रो ने बताया कि पोल्ट्री-कम-फिश मॉडल से उन्हें विशेष लाभ मिल रहा है। मुर्गियों की बीट मछलियों के लिए चारा बन जाती है, जिससे लागत घटती है और लाभ बढ़ता है। वहीं ग्राम धनेली की महिला जमुना कोर्राम से आजीविका डबरी के संचालन की जानकारी ली गई तथा ग्राम कठोली की महिलाओं को उनकी बढ़ती आय के लिए प्रोत्साहित किया गया।
“दीदी के बखरी” पहल आज ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का नया रास्ता बन रही है। एकीकृत कृषि मॉडल से न केवल परिवार का पोषण सुधर रहा है, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है।










