
मनीष विद्यार्थी बुरहानपुर
KPN24:- मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के धूलकोट-बोरी क्षेत्र के करीब 8 हजार से ज्यादा आदिवासी किसानों के सामने अचानक रोटी-रोजी का संकट खड़ा हो गया। इतना ही नहीं उनके और उनके परिवार के सिर से छत छिन जाने का भी खतरा मंडराने लगा है। इससे इन आदिवासी किसानों की नींद उड़ गई है और वे समस्या का तत्काल समाधान नहीं मिलने पर आत्महत्या करने तक की बात कर रहे है।
पूरा मामला ये है कि कलेक्टर हर्ष सिंह के निर्देश के बाद जिला समिति ने क्षेत्र के करीब 8 हजार आदिवासी कब्जेदार किसानों के वनाधिकार पत्र आवेदन प्रकरण निरस्त कर दिए और इन कब्जेदार किसानों को हिदायत दी गई कि जल्दी से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर सरकारी जमीन खाली कर दो, नहीं तो सख्त कार्रवाई कर जमीन को मुक्त कराएंगे। इससे इस क्षेत्र के आदिवासी किसानों में सरकार और प्रशासन के प्रति नाराजगी है।
राज्यपाल और मानवाधिकार की आस
क्षेत्र के जनप्रतिनिधि अन्तरसिंह बर्डे ने बताया कि इस क्षेत्र में 1980 के दशक से आदिवासी किसान जमीन पर काबिज होकर खेती-किसानी करते आ रहे है। उनके वनाधिकार पट़टे कलेक्टर हर्षसिंह ने निरस्त कर दिए। जबकि ये प्रकरण जिला समिति के पास विचाराधीन थे लेकिन तत्काल प्रभाव के कलेक्टर के आदेश पर पट्टा निरस्तीकरण की यह निती मनमानी होकर आदिवासी किसानों के प्रति अन्यायपूर्ण है। ऐसे में क्षेत्र के करीब 8 हजार किसानों के पास परिवार के भरण-पोषण और पालन का संकट खड़ा हो जाएगा। जिससे किसानों को आत्महत्या या संघर्ष का रुख अपनाना पड़ेगा। जबकि आदिवासी किसान इन दोनों की परिस्थितियों की तरफ जाना नहीं चाहते है, क्योंकि आदिवासी किसान धर्मप्रेमी और प्रकृति प्रेमी होकर शांतिप्रिय जीवन यापन करते है। लेकिन प्रशासन की ये तानाशाही और मनमानी हमें मजबूर करेगी तो हमें भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलना होगा और इसके लिए हम भोपाल जाकर नेता प्रतिपक्ष सहित मानवाधिकार आयोग और राज्यपाल के दरबार में भी अपने अस्तित्व को बचाने की गुहार लगाएंगे।
शिवराजसिंह का आश्वासन अधूरा
आदिवासी नेता पवन कुमार बर्डे ने बताया कि उनके पूर्वक करीब 47 सालों से यहां खेती करते आ रहे है। सरकार ने अचानक क्षेत्र के 8 हजार वनाधिकार पट्टा प्रकरणों को निरस्त कर वन विभाग को आदेश दिया कि इस काबिज आदिवासी किसानों को सरकारी भूमि से खदेड़ दिया जाए। ऐसा कैसे संभव है कि 8 हजार आवेदकों में से सरकारी अमले को एक भी हितग्राही पात्र नहीं मिला। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कई बार सभाओं में मंच से घोषणा की थी कि 2005-06 से पूर्व के काबिज आदिवासी किसानों को वनाधिकार पत्र दिए जाएंगे ताकि उन्हें उस जमीन का मालिकाना हक मिल सकें लेकिन वर्तमान सरकार का आदिवासी के हक और अधिकार पर कोई ध्यान नहीं है। ऐसे में हमें कांगे्रस की शरण में जाना होगा।
बेघर होने का सता रहा डर
ग्राम उतांबी के सकलसिंग बामनिया ने बताया कि 2014-15 में बनी हम 8 हजार आदिवासी किसानों की पट्टा आवेदन की सूची को निरस्त कर वन विभाग के कर्मचारियों ने कहा है कि अपनी झोपड़ी-गृहस्थी और सारा सामान सरकारी जमीन से हटाओ नहीं तो हम तोड़ देंगे, तो ऐसे में हम बेघर और बेसहारा हो जाएंगे।










