
मनीष विद्यार्थी बुरहानपुर
KPN24:- यूं तो रक्तदान को महादान की संज्ञा दी गई है। लेकिन नैत्रदान भी ईश्वर की बसाई इस खूबसूरत दुनिया को करीब से जानने में बेहद मददगार साबित होता है। दान को लेकर बड़े-बड़े वादे-दावे करने वाला मानव समाज इन दोनों ही दानों से जी चुराता है। इसके पीछे एक कारण जहां जागरुकता की कमी है तो दूसरा अंधविश्वास भी है। कहने भर को पढ़ा लिखा तबका भी अंधविश्वास के मकडज़ाल में फंसकर रक्तदान और नैत्रदान से दूरी बनाए है। ऐसे में उन जरुरतमंदों का क्या होगा, जिनके साथ ईश्वर ने कोई कमी बरती हो। अब ऐसा तबका सभ्य समाज की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।
बता दें कि हमारे जिले की आबादी यूं तो करीब 6 लाख के पार है लेकिन हम जरुरतमंदों के लिए करीब ढाई साल महज दो जोड़ी आंखें दान करा पाए। ऐसा भी नहीं कि जिला नैत्र अस्पताल प्रबंधन ने इसके लिए प्रयास नहीं किए लेकिन प्रशासनिक प्रयासों पर अंधविश्वास भारी पड़ रहा है। जिला नैत्र अस्पताल प्रबंधन की माने तो मार्च 2023 से अब तक केवल दो परिवारों ने अपने परिजन का नैत्रदान कराया है।
अपने बाद दूसरे की दुनिया होगी रोशन
दरअसल, नैत्रदान का कॉन्सेप्ट ये है कि ईश्वर ने हमें सबकुछ बख्शा है लेकिन जब हम इस दुनिया से जाएंगे तो दूसरे किसी जरुरतमंद को दुनिया दिखाने में हमारी दान की हुई आंखें महती भूमिका अदा कर सकती है और इसमें कोई खर्च भी नहीं करना पड़ता। बस, संकल्प और इच्छाशक्ति से औरों के लिए खूबसूरत दुनिया की रोशनी फैलाई जा सकती है।
अगले जन्म में होंगे नैत्रहीन

कहनेभर को हम डिजिटल युग में हाईटेक और स्मार्ट गजेट्स का इस्तेमाल कर आधुनिक भले ही हो गए हो लेकिन आज भी हमारे उपर सदियों पुराने अंधविश्वास हावी है। ऐसी भ्रांति है कि नैत्रदान करने वाले व्यक्ति को अगले जन्म में नैत्रहीन जीवन मिलता है। जबकि इसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। मानव सभ्यता के अनुसार शरीर नश्वर है और किसी भी समाज में इसे जलाकर, बहाकर या मिट्टी में दबाकर किसी भी रुप में नष्ट ही किया जाता है तो उससे पहले शरीर का कोई भाग किसी का भाग्य बदल सकता है तो यहां भी हमें आधुनिक होकर सोच को बदलना होगा।
मृत्यु के 6 घंटे में करना होता है नैत्रदान
बता दें कि मृत्यु के 6 घंटे के भीतर ही करीब एक घंटे की प्रक्रिया में नैत्रदान कराया जा सकता है। इसके लिए जीवित अवस्था में सर्वसहमति से नैत्र अस्पताल जाकर एक सामान्य जानकारी का फार्म भरके दानदाता को अपनी सहमति देना होती है। इसके बाद इसकी जानकारी उनके निकट परिजनों को दे दी जाती है। फिर मृत्यु की अवस्था में उनके परिजन तत्काल इसकी सूचना नैत्र अस्पताल को देते है। फिर उनकी टीम जाकर करीब एक घंटे के ऑपरेशन की प्रक्रिया कर शरीर के बाकी हिस्से से छेड़छाड़ किए बगैर सुरक्षित ढंग से आंखें निकालकर प्रिजर्व कर लेती है।
चलाया जाता है जागरुकता पखवाड़ा
नैत्र विभाग इसके लिए हर साल 25 अगस्त से लेकर 8 सितंबर तक नैत्रदान पखवाड़ा चलाकर इसके लिए तरह-तरह के नुक्कड़ नाटक, पोस्टर, समझाईश और चौपाल के माध्यम से शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में जनजागरुकता के अभियान चलाती है। लेकिन ये अब तक केवल सरकारी प्रयास ही साबित हो रहे है। जब तक समाज इसमें रुचि लेकर अपना योगदान नहीं देगा, तब तक ऐसे आयोजनों का कोई औचित्य नहीं है।
आगे आकर करें नैत्रदान
नैत्रदान के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर कर जनसामान्य को मानवता के लिए आगे आना चाहिए। बीते सालों के आंकड़ों को आने वाले समय में पछाडक़र नैत्रदान में जिला नए कीर्तिमान सभी के सहयोग से बनाएगा। सभी को नैत्रदान के लिए आगे आना चाहिए।










