
KPN24 :- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी द्वारा पति को बेरोजगार होने का ताना मारना और आर्थिक तंगी के समय अनुचित मांगें करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने इसे तलाक का वैध आधार मानते हुए पति को तलाक की अनुमति दे दी।
जस्टिस रजनी दुबे और अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए फैमली कोर्ट के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें पहले पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया गया था।
पति ने लगाए गंभीर आरोप
पति की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि पत्नी ने पीएचडी की डिग्री हासिल करने और स्कूल प्रिंसिपल बनने के बाद उसके प्रति व्यवहार पूरी तरह बदल दिया। कोविड महामारी के दौरान जब पति की आमदनी का स्रोत बंद हो गया, तब पत्नी ने बार-बार उसे बेरोजगारी के ताने दिए और छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा व गाली-गलौज करने लगी।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने उनकी बेटी को भी पिता के खिलाफ कर दिया और अगस्त 2020 में बेटी के साथ ससुराल छोड़कर चली गई, जबकि बेटे को पीछे छोड़ दिया। पत्नी ने एक पत्र लिखकर स्वेच्छा से पति और बेटे दोनों से संबंध तोड़ने का ऐलान भी किया था।
पत्नी नहीं हुई कोर्ट में पेश
रिकॉर्ड के अनुसार, नोटिस जारी होने के बावजूद पत्नी न तो कोर्ट में पेश हुई और न ही कोई जवाब दाखिल किया। इसके बावजूद फैमली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने बार एंड बेंच की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ कि पत्नी का व्यवहार पीएचडी डिग्री और उच्च वेतन वाली नौकरी मिलने के बाद बदल गया। कोर्ट ने माना कि पति के साथ दुर्व्यवहार, बार-बार अपमान और बेरोजगारी को लेकर ताने देना मानसिक क्रूरता की परिभाषा में आता है।
पीठ ने यह भी कहा कि पत्नी का घर छोड़ना और पति-बेटे से संबंध तोड़ना हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) और (i-b) के तहत क्रूरता और परित्याग दोनों की श्रेणी में आता है।
निचली अदालत की चूक
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि फैमली कोर्ट पति द्वारा प्रस्तुत मौखिक और दस्तावेजी सबूतों की गंभीरता को समझने में विफल रहा। निचली अदालत का आदेश अनुचित मानते हुए उसे खारिज कर दिया गया और पति के पक्ष में तलाक का आदेश पारित किया गया।










