
KPN24 :- छत्तीसगढ़ी साहित्य को नई दिशा देने वाले साहित्यकार, गायक और समाजसेवी डॉ. कृष्ण कुमार चंद्रा का पहला छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह ‘गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए – बहरतीन’ हाल ही में पाठकों के समक्ष आया है। यह पुस्तक केवल एक काव्य संग्रह नहीं, बल्कि लेखक के व्यक्तित्व, उनके जीवन दर्शन और गांव-माटी से गहरे जुड़ाव की झलक प्रस्तुत करती है।
डॉ. चंद्रा ने इस पुस्तक का नाम अपनी जन्मदात्री माता के सम्मान में ‘बहरतीन’ रखा है। उनके अनुसार यह संग्रह गांव की संस्कृति, परंपरा, तीज-त्यौहार, नाता-रिश्ता, लोकजीवन और भावनाओं का सजीव चित्रण है। संग्रह में विभिन्न छंदों – जैसे शास्त्रीय दोहा, लोक छंद और पवैया छंद – में रचित कविताएं संकलित हैं। साथ ही कर्मा गीत, जस गीत, जागरण गीत और होरी गीत जैसी लोकधुनों पर आधारित रचनाएं भी पाठकों को गहरी छाप छोड़ने में सक्षम हैं।
डॉ. चंद्रा लंबे समय से साहित्य, गायन और रंगमंच से जुड़े रहे हैं। वे गीतकार के साथ-साथ उत्कृष्ट कलाकार, उद्घोषक, शिक्षक और समाजसेवी के रूप में भी पहचाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में जहां एक ओर गांव की यादें, खेत-खार, बारी-बखरी और लोकसंस्कृति का चित्रण है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक चेतना, शिक्षा का महत्व, नारी सम्मान और पीढ़ीगत रिश्तों की चिंता भी देखने को मिलती है।
संग्रह के कुछ गीत जैसे “मोला मोर परेवा पाँखी गांव अगोरत हे” और “जंगल मा डांका परे हे, कोन बचाही” खासतौर पर पाठकों और श्रोताओं को प्रभावित कर रहे हैं। ये गीत न सिर्फ संवेदनशील भाव जगाते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता का संदेश भी देते हैं।
हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में समान रूप से सक्रिय डॉ. चंद्रा पहले भी “आनंद के दोहे” नामक हिंदी काव्य संग्रह प्रकाशित कर चुके हैं। हाल ही में उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर अपनी शैक्षणिक और साहित्यिक यात्रा को और ऊंचाई दी है।
साहित्य जगत ने ‘बहरतीन’ को छत्तीसगढ़ी कविता में एक महत्वपूर्ण योगदान बताया है। समीक्षकों का मानना है कि यह संग्रह न सिर्फ पढ़ने में आनंद देगा, बल्कि गुनगुनाने और लोकधुनों में डूबने का अनुभव भी कराएगा।










