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खरगोन के अनूठे मंदिर में पुरुष खेलते हैं गरबा, महिलाएं रहती हैं वर्जित

मनीष विद्यार्थी खरगोन 
KPN24:- नवरात्रि का पर्व हो और माता के दरबार में महिलाएं गरबा न करें, ऐसा तो संभव ही नहीं! लेकिन निमाड़ क्षेत्र के खरगोन के सराफा बाजार में एक ऐसा मंदिर है, जहां यह परंपरा बिल्कुल उलट है। यहां पर महिलाएं मंदिर में बैठकर गरबा देखती हैं और भजन गाती हैं, जबकि पुरुष श्रद्धालु हाथों से ताल मिलाकर गरबा करते हैं। यह अनोखी परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जो इस मंदिर को खास बनाती है।

इस मंदिर की एक और विशेषता है कि यहां स्थित एक कुएं का पानी श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान ही स्नान के लिए उपयोग करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पानी से कष्टों का निवारण होता है।

मंदिर की स्थापना और श्रद्धा की पृष्ठभूमि

मंदिर के पुजारी, रामकृष्ण भट्ट बताते हैं कि मंदिर में विराजित माता की पिंडियां इस कुएं से ही निकाली गई थीं। एक बहुत पुरानी कथा है, जिसमें मंदिर के संस्थापक भटाम भट्ट दादा को देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि वे घर के बाहर झिरी में स्थित हैं। इसके बाद भटाम भट्ट दादा ने कुएं से मूर्तियां निकालीं और पीपल के नीचे स्थापित कर पूजा शुरू की। इस प्रकार, माता शीतल जल से निकलीं और इस मंदिर की महिमा में वृद्धि हुई। यहां माता की नौ मूर्तियां स्थापित हैं, जो श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र हैं।

एक ही चबूतरे पर नौ देवियां और अन्य आराध्य

मंदिर में नौ देवियां एक ही चबूतरे पर विराजमान हैं, जिनमें ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, इंद्राणी, वाराही, चामुण्डा, महालक्ष्मी, सरस्वती और शीतला की मूर्तियां शामिल हैं। इसके अलावा महाबलेश्वर, अष्ट भैरव और हनुमानजी भी इस चबूतरे पर प्रतिष्ठित हैं। भक्तों की श्रद्धा यहां इतनी प्रगाढ़ है कि वे माता के चबूतरे की परिक्रमा करने के साथ-साथ अन्य देवताओं की भी परिक्रमा करते हैं।

सात गरबे की परंपरा और पुरुषों का गरबा

नवरात्रि के दौरान, मंदिर में पुरुष श्रद्धालु खास तौर से सात गरबे करते हैं। यह परंपरा पिछले 150 सालों से चली आ रही है। यहां के पुरुष डांडियां नहीं, बल्कि हाथों से ताल मिलाकर गरबा करते हैं। गरबा करते हुए वे माता के चबूतरे की पूरी परिक्रमा करते हैं, जबकि पास में स्थित चबूतरे पर महिलाएं बैठकर भजन गाती हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे एक ऐतिहासिक कारण बताया जाता है। पुरानी कथाओं के अनुसार, महिलाएं बड़े घूंघट में रहती थीं और बुजुर्गों के सामने लाज के कारण वे पुरुषों के साथ गरबा करने से कतराती थीं। यही परंपरा आज भी इस मंदिर में कायम है।

कुएं में स्नान की मान्यता

मंदिर से जुड़े सुबोध जोशी बताते हैं कि नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु तड़के पांच बजे से कुएं के शीतल जल से स्नान करते हैं। इस स्नान के बाद वे गीले कपड़े पहनकर ही माता के दर्शन करते हैं और जल अर्पित करते हैं। इसके बाद उसी जल को चरणामृत के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह माना जाता है कि कुएं के जल से स्नान करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर होते हैं।

विशेष भोग की परंपरा

नवरात्रि में विशेष रूप से माता को पान के बीड़े और ज्वार की धानी का भोग अर्पित किया जाता है। महाआरती के बाद यह प्रसाद श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पान के बीड़ों में उपयोग की जाने वाली जड़ी-बूटियां पेट की गर्मी को शांत करने में सहायक होती हैं और उपवास करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह विशेष रूप से ऊर्जा प्रदान करती हैं।

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Author: Kpn 24

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