
संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना को लेकर महिलाओं ने रखा व्रत, मानिकपुरी समाज की नारी शक्तियों ने निभाई छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा
Kpn24.com जांजगीर-चांपा 02 सितंबर 2026
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा, मातृशक्ति की आस्था और संतान के प्रति मां के निश्छल प्रेम का प्रतीक कमरछठ (हलषष्ठी) पर्व बुधवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। इसी कड़ी में ग्राम पंचायत खोखसा में महतारी सेवा समिति, मानिकपुरी समाज, जिला जांजगीर-चांपा से जुड़ी नारी शक्तियों ने एकजुट होकर विधि-विधान से कमरछठ की पूजा-अर्चना की।
सुबह से ही पूजा स्थल पर महिलाओं की चहल-पहल शुरू हो गई थी। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार महिलाओं ने पूजा की तैयारियां पूरी कीं और सामूहिक रूप से हलषष्ठी माता की आराधना कर अपनी संतानों की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली के लिए मंगलकामना की।
मां की ममता और आस्था का दिखा अनूठा संगम
कमरछठ केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि मां के त्याग, तपस्या और संतान के प्रति असीम प्रेम की अभिव्यक्ति माना जाता है। छत्तीसगढ़ में इसे कमरछठ, खमरछठ या हलषष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर माताएं व्रत रखकर विशेष पूजा-अर्चना करती हैं और अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य तथा दीर्घायु की कामना करती हैं।
खोखसा में आयोजित पूजा के दौरान भी यही भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना कर पारंपरिक मान्यताओं का पालन किया। पूजा स्थल पर आस्था और भक्ति का वातावरण बना रहा तथा महिलाओं ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं।
सगरी सजाकर की पूजा-अर्चना
कमरछठ पर्व की पारंपरिक पूजा पद्धति में सगरी का विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं सगरी तैयार कर उसके आसपास पूजा सामग्री रखती हैं तथा हलषष्ठी माता की आराधना करती हैं। स्थानीय परंपरा में पलाश और कांसी की टहनियों सहित विभिन्न पूजन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। पूजा के दौरान व्रत कथा का श्रवण भी किया जाता है।
महतारी सेवा समिति की महिलाओं ने भी इसी लोकपरंपरा को आगे बढ़ाते हुए सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की। इस दौरान धार्मिक आस्था के साथ-साथ महिलाओं के बीच सामाजिक एकता और आपसी सद्भाव की भावना भी दिखाई दी।
लोकसंस्कृति को जीवंत रखने का संदेश
आज के आधुनिक दौर में जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों का स्वरूप लगातार बदल रहा है, वहीं इस तरह सामूहिक रूप से पर्व मनाना छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। कमरछठ जैसे पर्व केवल धार्मिक आस्था से नहीं जुड़े हैं, बल्कि इनके माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपरा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का अवसर भी मिलता है।
मानिकपुरी समाज की महिलाओं द्वारा आयोजित इस सामूहिक पूजा ने यह संदेश भी दिया कि समाज की नारी शक्ति अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
संतान के मंगल की कामना के साथ हुआ व्रत का समापन
पूजा-अर्चना के दौरान महिलाओं ने हलषष्ठी माता से अपनी संतानों के सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की प्रार्थना की। कमरछठ की परंपरा में पसहर चावल तथा हल से न जुड़ी भूमि से प्राप्त पारंपरिक खाद्य सामग्री का विशेष महत्व माना जाता है।
ग्राम पंचायत खोखसा में आयोजित यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ मातृशक्ति की एकजुटता, सामाजिक सहभागिता और छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के संरक्षण का सुंदर उदाहरण बनकर सामने आया।
मां की ममता, आस्था की शक्ति और परंपरा की जड़ों से जुड़ा कमरछठ पर्व—खोखसा में इसी भाव के साथ श्रद्धा और उल्लास के बीच मनाया गया।










