
रायपुर, 06 फरवरी 2026 KPN24.com
जिन हाथों ने कभी हिंसा की राह चुनी थी, आज वही हाथ हुनर गढ़ रहे हैं। राज्य शासन की नक्सल पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित 40 माओवादियों को मुख्यधारा में लौटाकर आजीविका मूलक प्रशिक्षण से जोड़ा जा रहा है। उत्तर बस्तर कांकेर के चौगेल (मुल्ला) कैंप में ‘हिंसा से हुनर’ की यह पहल अब बदलाव की मिसाल बन रही है।
चौगेल कैंप बना ‘कौशलगढ़’
बीएसएफ कैंप परिसर में संचालित प्रशिक्षण केंद्र में ड्राइविंग, सिलाई, काष्ठशिल्प, सहायक इलेक्ट्रिशियन जैसे ट्रेड्स में 20-20 के बैच बनाकर सतत प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा भी उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे निरक्षर युवा-युवतियां भी आत्मनिर्भर बन सकें।
प्रशिक्षण से बदली जिंदगी
आत्मसमर्पित माओवादी मनहेर तारम और नरसिंह नेताम फोरव्हीलर ड्राइविंग सीख रहे हैं, वहीं काजल वेड़दा सिलाई में अपना सपना साकार कर रही हैं। सुकदू पद्दा (19) जैसे युवा, जो निरक्षर थे, अब हुनर और शिक्षा—दोनों से जुड़कर भविष्य संवार रहे हैं। स्वास्थ्य परीक्षण, खेल और मनोरंजन गतिविधियां भी नियमित रूप से आयोजित की जा रही हैं।
आगे भी बढ़ेगा दायरा
नोडल अधिकारी विनोद अहिरवार के अनुसार, जल्द ही मशरूम उत्पादन, बागवानी सहित अन्य स्वरोजगार पाठ्यक्रम भी शुरू होंगे। उद्देश्य साफ है—आत्मसमर्पित युवाओं को सम्मानजनक, आत्मनिर्भर जीवन की ओर ले जाना।
निष्कर्ष:
चौगेल कैंप में चल रही यह पहल न सिर्फ माओवाद के दायरे को सिमटा रही है, बल्कि लौटे हुए कदमों को स्थायी भविष्य भी दे रही है—जहां बंदूक नहीं, हुनर पहचान बन रहा है।










