
साहित्योत्सव 2026 में छत्तीसगढ़ी सहित लोक बोलियों के संरक्षण और विस्तार पर रखा दमदार पक्ष
KPN24.com रायपुर 03 अप्रैल 2026
छत्तीसगढ़ की समृद्ध भाषाई विरासत को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाते हुए वरिष्ठ साहित्यकार शकुंतला तरार ने कहा कि “भाषा जहाँ माथे का मुकुट होती है, वहीं छत्तीसगढ़ की बोलियाँ उस मुकुट में जड़ी रत्न-मणियाँ हैं, जो उसकी सुंदरता और मजबूती दोनों को बढ़ाती हैं।”
वे राजधानी में आयोजित प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजन साहित्योत्सव 2026 में अपने विचार रख रही थीं। यह आयोजन साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त तत्वावधान में 30 मार्च से 4 अप्रैल तक नई दिल्ली के रवींद्र भवन परिसर में आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम का शुभारंभ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने किया। इस भव्य साहित्यिक महोत्सव में देश-विदेश के 650 से अधिक प्रतिष्ठित लेखक और विद्वान 100 से अधिक सत्रों में भाग ले रहे हैं, जहाँ 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व हो रहा है।
बोलियाँ बनाती हैं भाषा को जीवंत और समृद्ध
अपने वक्तव्य में शकुंतला तरार ने कहा कि किसी भी भाषा की असली ताकत उसकी क्षेत्रीय बोलियों में छिपी होती है। छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंडी, कुडुख, भतरी, बंजारी, मुरिया, माड़िया, धुरवा, दोरला, कोरवा, बैगानी, भुंजिया, धनवारी और सावरा जैसी बोलियाँ भाषा की विविधता और सांस्कृतिक संपन्नता को दर्शाती हैं।
उन्होंने कहा कि जिस तरह हर रत्न की अपनी चमक और विशेषता होती है, उसी प्रकार हर बोली का अपना अलग लहजा, लोकगीत और शब्दकोश होता है, जो भाषा को और अधिक प्रभावशाली और जीवंत बनाता है।
शिक्षा में भी बढ़ रहा स्थानीय बोलियों का महत्व
तरार ने बताया कि Ministry of Tribal Affairs द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई कई स्थानीय बोलियों में शुरू की गई है। इससे न केवल बच्चों की शिक्षा आसान होगी बल्कि इन बोलियों का संरक्षण और मानकीकरण भी संभव हो सकेगा।
पंडवानी से दुनिया तक पहुँची छत्तीसगढ़ी
उन्होंने अपने वक्तव्य में प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई का उदाहरण देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की लोकबोलियाँ और लोककला दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई ने पुरुष-प्रधान पंडवानी परंपरा में नई ऊर्जा भरते हुए कापालिक शैली में महाभारत की कथा को जीवंत रूप दिया।
तरार ने कहा कि भाषा और बोली केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का दर्पण होती हैं। यदि इनका संरक्षण किया जाए तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर बन सकती हैं।
कार्यक्रम में उनके प्रभावशाली वक्तव्य की साहित्यकारों और भाषाविदों ने सराहना करते हुए उन्हें बधाई दी।










