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प्रकृति में जनजातीय समाज की अटूट आस्था, देवी-देवताओं के वास से जल-जंगल का संरक्षण : मंत्री रामविचार नेताम

सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण पर हुआ मंथन, पेसा-वनाधिकार समन्वय के लिए बनेगी टास्क फोर्स

KPN24.com रायपुर 10 अप्रैल 2026

आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि जनजातीय समाज की संस्कृति और परंपराओं में प्रकृति के प्रति गहरी आस्था निहित है। जल, जंगल, जमीन, नदी-नाले और पहाड़ों को जनजातीय समुदाय केवल संसाधन नहीं बल्कि देवी-देवताओं का निवास मानते हैं। यही कारण है कि वनवासी समाज सदियों से प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।

मंत्री श्री नेताम नवा रायपुर स्थित जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरटीआई) में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय संवाद सम्मेलन ‘छत्तीसगढ़ कॉमन्स क्विनिंग’ के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन को लेकर व्यापक मंथन हुआ है और इससे निकलने वाले सुझावों को राज्य सरकार नीति निर्माण और जनहित में लागू करने के लिए गंभीरता से कार्य करेगी।
जनजातीय कल्याण के लिए बनेगी उच्च स्तरीय टास्क फोर्स
मंत्री श्री नेताम ने बताया कि राज्य सरकार जनजातीय समुदायों की समस्याओं के समाधान और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए उच्च स्तरीय टास्क फोर्स गठित करने जा रही है। इसकी अध्यक्षता स्वयं मुख्यमंत्री करेंगे। साथ ही विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल कर एक विशेष कार्यान्वयन समिति भी बनाई जाएगी, जो नीतिगत निर्णयों के प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन को सुनिश्चित करेगी।
उन्होंने कहा कि पेसा (पंचायत उपबंध अधिनियम) और वनाधिकार अधिनियम (एफआरए) के क्रियान्वयन में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों, विशेषकर सीमाओं के निर्धारण जैसी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी का भाव जरूरी है क्योंकि हम केवल इनके उपयोगकर्ता ही नहीं बल्कि संरक्षक भी हैं।
जल-जंगल-जमीन से जुड़ी है जनजातीय संस्कृति
आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने कहा कि प्रस्तावित टास्क फोर्स पेसा और वनाधिकार अधिनियम के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेगी। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की बोली-भाषा, परंपरा और सामुदायिक नेतृत्व हमारी समृद्ध विरासत है। जनजातीय समुदाय प्रकृति को मां और देवता के रूप में पूजते हैं और उनके दैनिक जीवन से लेकर जीवन के अंतिम संस्कार तक प्रकृति से जुड़ी परंपराएं दिखाई देती हैं।
उन्होंने बताया कि सम्मेलन में छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से आए 300 से अधिक प्रतिभागियों, नीति विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और ग्राम प्रमुखों ने भाग लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र राज्य की लगभग 70 लाख एकड़ कॉमन्स भूमि रही, जिसमें जंगल, चारागाह और जल स्रोत शामिल हैं और जो ग्रामीण व जनजातीय समुदाय की जीवनरेखा हैं।
सामुदायिक सहयोग से ही संभव है वनों की रक्षा
प्रधान मुख्य वन संरक्षक वी. श्रीनिवास राव ने कहा कि विशाल वनों और जैव विविधता की सुरक्षा सामुदायिक सहयोग के बिना संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य की वन नीतियां प्रतिबंधात्मक नहीं बल्कि विनियामक और संरक्षण आधारित हैं।
मनरेगा आयुक्त तारण प्रकाश सिन्हा ने कहा कि जल संरक्षण जनजातीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है और मनरेगा के माध्यम से वंचित समुदायों को जल प्रबंधन से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं रायपुर कलेक्टर गौरव सिंह ने कहा कि जल संरक्षण कोई जटिल विज्ञान नहीं बल्कि सदियों के अनुभव से विकसित सामुदायिक ज्ञान है।
कॉमन्स केवल संसाधन नहीं, संस्कृति की पहचान
सम्मेलन में यह निष्कर्ष सामने आया कि कॉमन्स केवल आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आधार भी हैं। इस अवसर पर श्री बोरा ने जनजातीय लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के दस्तावेजीकरण तथा कॉपीराइट संरक्षण के लिए विशेष स्टूडियो स्थापित करने की योजना भी साझा की।
कार्यक्रम में नेल्सन मंडेला पुरस्कार विजेता शेर सिंह आंचला, पद्मश्री पांडी राम मंडावी, पद्मश्री जगेश्वर यादव, गौर मारिया कलाकार लक्ष्मी सोरी और इंदु नेताम ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का आह्वान किया।
इस आयोजन को सफल बनाने में अपर संचालक संजय गौड़ और टीआरटीआई की संयुक्त संचालक गायत्री नेताम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम का आयोजन आदिम जाति विकास विभाग, टीआरटीआई और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी द्वारा ‘प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स’ पहल के तहत किया गया, जिसमें आईआईटी-भिलाई, यूएनडीपी, बीआरएलएफ, एक्सिस बैंक फाउंडेशन सहित कई संस्थानों का सहयोग रहा।

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Author: Kpn 24

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