
KPN24.com रायपुर 18 अप्रैल 2026
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो संघर्ष से सफलता तक की नई राह दिखाती है। वन विभाग की पहल और वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में तैयार तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज विकास, पुनर्वास और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है। जो इलाका कभी उपेक्षित था, वही अब पर्यटन और उम्मीद का केंद्र बन गया है।
उपेक्षा से उत्कर्ष तक:
सुकमा नगर से 1 किमी दूर जर्जर क्षेत्र को विकसित कर आकर्षक पर्यटन स्थल बनाया गया।
महिलाओं की बदली तकदीर:
“तुंगल नेचर कैफे” का संचालन 10 महिलाओं के हाथों में, जिनमें
▪️ 5 पूर्व नक्सली (आत्मसमर्पित)
▪️ 5 नक्सल हिंसा से प्रभावित महिलाएँ शामिल
प्रशिक्षण से आत्मनिर्भरता:
जगदलपुर और सुकमा में विशेष प्रशिक्षण के बाद महिलाएँ आज आत्मविश्वास के साथ रोजगार कर रहीं।
पर्यटन में तेजी:
▪️ 31 दिसंबर 2025 से शुरू
▪️ 30 मार्च 2026 तक 8,889 पर्यटक पहुंचे
▪️ करीब ₹2.92 लाख की आय अर्जित
एडवेंचर और प्रकृति का संगम:
▪️ कयाकिंग
▪️ पैडल बोटिंग
▪️ बाँस राफ्टिंग
▪️ स्थानीय व्यंजनों का स्वाद
बदलाव की असली तस्वीर
तुंगल इको-पर्यटन केंद्र सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की जीवंत मिसाल है।
जो महिलाएँ कभी भय और हिंसा के माहौल में जी रही थीं, आज वे आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं।
निष्कर्ष
यह पहल साबित करती है कि सही दिशा, प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर जीवन की राह पूरी तरह बदली जा सकती है।
तुंगल इको-पर्यटन केंद्र बस्तर की बदलती तस्वीर का प्रतीक बन चुका है—जहाँ अब बंदूक नहीं, बल्कि विकास और विश्वास की आवाज गूंज रही है।










