
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के आकाश में मंडराया पेरेग्रीन फाल्कन, वन्यजीव प्रेमियों में उत्साह
KPN24:- दुनिया का सबसे तेज़ उड़ान भरने वाला पक्षी पेरेग्रीन फाल्कन (शाहीन बाज) एक बार फिर छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में नजर आया है। ‘आसमान का चीता’ कहे जाने वाले इस दुर्लभ और शक्तिशाली शिकारी पक्षी की मौजूदगी ने वन विभाग के साथ-साथ वन्यजीव प्रेमियों में भी उत्साह भर दिया है।
पेरेग्रीन फाल्कन अपनी अविश्वसनीय गति और सटीक शिकार तकनीक के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यह ऊँचाई से गोता लगाते हुए शिकार पर झपट्टा मारता है और इस दौरान इसकी गति 320 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच जाती है। सामान्य उड़ान में भी यह लगभग 300 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ने में सक्षम होता है। इसके मजबूत, नुकीले पीले पंजे और तीक्ष्ण दृष्टि इसे उड़ते हुए भी अन्य पक्षियों को पकड़ने में माहिर बनाते हैं।
इस दुर्लभ दृश्य को वन रक्षक ओमप्रकाश राव ने अपने कैमरे में कैद किया है। इससे पहले भी आमामोरा ओड़ क्षेत्र के समीप शेष पगार जलप्रपात के पास ड्रोन कैमरे में इस पक्षी की उपस्थिति दर्ज की गई थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र पेरेग्रीन फाल्कन के लिए अनुकूल आवास बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पेरेग्रीन फाल्कन न केवल गति का प्रतीक है, बल्कि यह अपनी जीवनभर की जोड़ी और वफादारी के लिए भी जाना जाता है। यह प्रायः अकेले या जोड़े में रहता है और इसका औसत जीवनकाल 12 से 15 वर्ष होता है। उदंती-सीतानदी जैसे संरक्षित वनों में इसका दिखना इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ का पर्यावरण और जैव विविधता विश्वस्तरीय वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और अनुकूल है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में आयोजित बर्ड सर्वे के दौरान बारनवापारा अभ्यारण्य में भी ऑरेंज ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन और ब्लैक-कैप्ड किंगफिशर जैसे दुर्लभ एवं आकर्षक पक्षी देखे गए हैं, जो राज्य में पक्षी विविधता के निरंतर विस्तार को दर्शाता है।
गौरतलब है कि वन मंत्री केदार कश्यप वन एवं वन्यजीव संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सतत निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष जोर दे रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) श्री अरुण कुमार पांडेय के नेतृत्व में वन विभाग की टीम लगातार संरक्षण के प्रयासों में जुटी है, जिसके सकारात्मक परिणाम अब ज़मीन पर साफ दिखाई दे रहे हैं।
वन विभाग की यह उपलब्धि न केवल अभिलेखीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ को वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता के वैश्विक मानचित्र पर और मजबूत पहचान भी दिला रही है।










